हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू द्वारा ग़ाज़ा का नियंत्रण न छोड़ने की घोषणा एक बार फिर यह साबित करती है कि इज़रायल की नीतियाँ शांति नहीं, बल्कि स्थायी टकराव को जन्म दे रही हैं।वर्षों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संघर्ष-विराम, मानवीय सहायता और दो-राष्ट्र समाधान की बातें करने वाला इज़रायल ज़मीनी हक़ीक़त में बिल्कुल उलटी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
नेतन्याहू का यह कहना कि हमास के पूर्ण निरस्त्रीकरण तक ग़ाज़ा पर नियंत्रण बना रहेगा, दरअसल सामूहिक दंड की नीति को सही ठहराने का प्रयास है। ग़ाज़ा की पूरी आबादी को एक संगठन के नाम पर बंधक बनाकर रखना अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानूनों का खुला उल्लंघन है।
रफ़ाह क्रॉसिंग को केवल लोगों के लिए खोलना और वस्तुओं की आपूर्ति रोकना यह दर्शाता है कि इज़रायल ग़ाज़ा की अर्थव्यवस्था और जीवन-रेखा को जानबूझकर अपंग बनाए रखना चाहता है। यह नीति भुखमरी, बेरोज़गारी और मानवीय संकट को और गहरा करती है, जबकि इज़रायल अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने स्वयं को “सुरक्षा के लिए मजबूर बताता है।
सबसे गंभीर बात यह है कि नेतन्याहू द्वारा स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य के विचार को सिरे से खारिज कर देना वर्षों पुराने वादों और संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों की खुली अवहेलना है। यदि एक संप्रभु फ़िलिस्तीनी राज्य की संभावना ही नहीं छोड़ी जाती, तो शांति वार्ता केवल एक दिखावा बनकर रह जाती है।
इज़रायल की मौजूदा नीति स्पष्ट रूप से बताती है कि उसका लक्ष्य शांति नहीं, बल्कि स्थायी नियंत्रण है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी और दोहरे मानदंड इस अन्याय को और मज़बूत कर रहे हैं। जब तक तक कब्ज़ा, नाकेबंदी और वादा-खिलाफी जारी रहेगी, तब तक पश्चिम एशिया में स्थायी शांति केवल एक खोखला नारा ही बनी रहेगी।
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